दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के छह अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया है। इन अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने एक मामले में भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) के एक पूर्व अधिकारी को आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) किए जाने को चुनौती देते समय सरकार के साथ हुए पत्राचार के बारे में अदालत के सामने गलत बयान दिया था [अशोक कुमार अग्रवाल बनाम सुशील दीवान और अन्य]।
जस्टिस मधु जैन ने पूर्व अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल की याचिका को स्वीकार करते हुए विशेष न्यायाधीश (सीबीआई अदालत) को निर्देश दिया कि वे सीबीआई अधिकारियों सुशील दीवान, विनीत विनायक, अमित कुमार, रमन त्यागी, प्रेम कुमार गौतम और मो. आज़ाद के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज करें।
अदालत ने कहा कि इन अधिकारियों पर लगाए गए आरोपों में भारतीय दंड संहिता की धारा 191 (झूठा सबूत देना), 193 (झूठा सबूत देने या गढ़ने के लिए सज़ा) और 209 (अदालत में धोखाधड़ी या बेईमानी से झूठा दावा करने के लिए सज़ा) के तहत अपराधों का “उचित आधार” है।
अदालत ने कहा है कि इनके ख़िलाफ़ लिखित शिकायत दर्ज की जाए और इस फैसले की प्राप्ति की तारीख से चार सप्ताह के भीतर इसे संबंधित अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट को भेजी जाए।
यह मामला अग्रवाल के खिलाफ सीबीआई के उस केस से जुड़ा है जिसमें उन पर आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने का आरोप था। जनवरी 2016 में, हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंज़ूरी को अमान्य करार दिया था, जिसके बाद उन्हें आरोपमुक्त कर दिया गया था।
इसके बाद सीबीआई ने उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार किया। हालांकि, कानून और न्याय मंत्रालय ने जून 2016 में राय दी कि मामले को आगे बढ़ाने का कोई उचित आधार नहीं है। कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने जुलाई 2016 में सीबीआई को अपनी राय बताई थी।
जब अग्रवाल ने बाद में जांच के दौरान ज़ब्त किए गए दस्तावेज़ों को वापस करने की मांग की, तो सीबीआई ने 2 अगस्त, 2016 के अपने जवाब में कहा कि आगे की कानूनी कार्रवाई के बारे में मंत्रालय के साथ बातचीत “चल रही थी”।
हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि ऐसी कोई बातचीत नहीं हो रही थी। इसके बजाय, सीबीआई आंतरिक रूप से इस बात पर विचार कर रही थी कि क्या पुनर्विचार की मांग की जाए और आगे की कानूनी राय ली जाए।
कोर्ट ने सीबीआई के जवाब के कई ड्राफ़्ट की जांच की और पाया कि एक शुरुआती ड्राफ़्ट में साफ़ तौर पर लिखा था कि कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। बाद में उस बयान को हटा दिया गया और उसकी जगह हाथ से लिखी हुई यह बात जोड़ दी गई कि मंत्रालय के साथ बातचीत चल रही थी।
कोर्ट ने माना कि यह बदलाव सिर्फ़ “शब्दों का गलत चुनाव” नहीं था। उसे इस आरोप का “उचित आधार” मिला कि कोर्ट के सामने गलत बयान रखा गया था और “न्याय के हित में” जांच करना ज़रूरी था।
कोर्ट ने इस बात पर भरोसा करने से भी इनकार कर दिया कि सीबीआई ने बाद में 9 अगस्त, 2016 के जवाब में स्थिति को सही कर लिया था या अग्रवाल को कोई नुकसान नहीं हुआ था।
कोर्ट ने कहा, “जवाब तैयार करने, बदलने, जांचने, प्रोसेस करने, मंज़ूरी देने और दाखिल करने की संबंधित गतिविधियां, और साथ ही पिछले ड्राफ़्ट और फ़ाइल-नोटिंग से पता चलने वाली जानकारी, इस बात का उचित आधार देती हैं कि संबंधित अधिकारियों ने एक ऐसा दावा आगे बढ़ाने में हिस्सा लिया, जिसके बारे में उन्हें पता था कि वह मौजूदा स्थिति के खिलाफ़ है। ये हालात किसी पक्ष द्वारा अपनी बात साबित न कर पाने से कहीं ज़्यादा गंभीर बात ज़ाहिर करते हैं।”
इसलिए, कोर्ट ने अग्रवाल की याचिका को मंज़ूरी दे दी और शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)